"एक मुसाफिर"
जिन्दगी की इन तमाम किताबों को, इन तमाम पहलुओं को पढ़कर , जानकर और आज़माकर एक बारगी ऐसा लगा की क्यूँ ना इसके कुछ ख़ास पहलुओं को , कुछ खास पन्नों को एक बार पलट कर देख लिया जाए। गौर से देखा तो इस ज़िन्दगी में उम्मीद थी, इसमें खुशियाँ भी थीं, गम भी थे , कदूरतें भी , मिठास भी , आँसू भी और आहें भी , आरज़ू.... जो सि़र्फ आरजू़ बन के रह गईं , यादें.... जो सिर्फ यादें बन के रह गईं....
....इन तमाम पन्नों को खुद में समेटे चला जा रहा हूँ "मैं"... एक मुसाफिर......

Comments
Post a Comment